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हाईकोर्ट का अहम फैसला : आरोपी को भी है वाद के जल्दी निस्तारण का अधिकार

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि वाद के जल्दी निस्तारण का अधिकार शिकायतकर्ता को ही नहीं बल्कि आरोपी को भी है। कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने निचली अदालतों को यह निर्देश भी दिया कि वे आपराधिक कार्यवाहियाें का निस्तारण शीघ्रता से समाप्त करें। क्योंकि, सुनवाई जल्दी पूरी हो, इसका अधिकार शिकायत करने वाले और आरोपी दोनों व्यक्तियों का अधिकार है। कोर्ट ने 24 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमसेरी ने अलीगढ़ के डॉ. मीराज अली व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने इतने पुराने मामले में आपराधिक कार्यवाही को केवल डिस्चार्ज आवेदन के चरण तक पहुंचने पर नाराजगी जताई। कहा कि याचियों की इतने सालों तक कार्रवाई पूरी न होने की पीड़ा की भरपाई नहीं की जा सकती है।

मामले में अलीगढ़ केयाची डॉ. मेराज अली के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 467 और 468 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। जांच के बाद 18 नवंबर 2000 को चार्जशीट दाखिल की गई और संज्ञान भी लिया गया। आवेदकों ने 23 दिसंबर 2021 को डिस्चार्ज (उन्मोचित) के लिए एक आवेदन दाखिल किया था, जिसे नौ मार्च 2022 कोआक्षेपित आदेश के जरिए खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने पाया कि याचियों के खिलाफ रंजिश की वजह से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि वाद के जल्दी निस्तारण का अधिकार शिकायतकर्ता को ही नहीं बल्कि आरोपी को भी है। कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने निचली अदालतों को यह निर्देश भी दिया कि वे आपराधिक कार्यवाहियाें का निस्तारण शीघ्रता से समाप्त करें। क्योंकि, सुनवाई जल्दी पूरी हो, इसका अधिकार शिकायत करने वाले और आरोपी दोनों व्यक्तियों का अधिकार है। कोर्ट ने 24 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमसेरी ने अलीगढ़ के डॉ. मीराज अली व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने इतने पुराने मामले में आपराधिक कार्यवाही को केवल डिस्चार्ज आवेदन के चरण तक पहुंचने पर नाराजगी जताई। कहा कि याचियों की इतने सालों तक कार्रवाई पूरी न होने की पीड़ा की भरपाई नहीं की जा सकती है।

मामले में अलीगढ़ केयाची डॉ. मेराज अली के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 467 और 468 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। जांच के बाद 18 नवंबर 2000 को चार्जशीट दाखिल की गई और संज्ञान भी लिया गया। आवेदकों ने 23 दिसंबर 2021 को डिस्चार्ज (उन्मोचित) के लिए एक आवेदन दाखिल किया था, जिसे नौ मार्च 2022 कोआक्षेपित आदेश के जरिए खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने पाया कि याचियों के खिलाफ रंजिश की वजह से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

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