Home उत्तर प्रदेश Allahabad high court: तय समय में बनाकर नहीं दिए फ्लैट, पैसा लौटाए प्राधिकरण

Allahabad high court: तय समय में बनाकर नहीं दिए फ्लैट, पैसा लौटाए प्राधिकरण

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तय समय में फ्लैट न आवंटित कर पाने पर हाईकोर्ट ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह याचियों (फ्लैट बुक कराने वाले) कोे उनके द्वारा जमा की गई रकम को नौ प्रतिशत ब्याज की दर से वापस करे। कोर्ट ने कहा है कि याचियों को उनकी रकम दो माह में दे दी जाए। ब्याज की रकम जमा की गई तिथि से देनी होगी।

यही नहीं कोर्ट ने प्राधिकरण को प्रत्येक याची को बीस हजार रुपये हर्जाना भी देने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने शीला रस्तोगी व अन्य, समेद्दीन व 37 अन्य और गौरव गुलाटी व अन्य की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में याचियों की ओर से दाखिल याचिकाओं को आंशिक रूप से ही स्वीकार किया है।

मामले में याचियों की ओर से तर्क दिया गया कि ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने 2013 में लोगों को आवासीय फ्लैट मुहैया कराने के लिए एक ऑफर दिया। कहा कि उसकी तीन इलाकों (ओमिक्रोन, ओमिक्रॉन 1 व सेक्टर 12) में विभिन्न योजनाएं प्रस्तावित हैं। इसके तहत बहुमंजिला इमारत में फ्लैटों की बुकिंग की जा सकती है।

बुकिंग कराने वालों को 2017 तक कब्जा दे दिया जाएगा। याचियों ने योजना के तहत नकद डाउन पेमेंट के आधार पर एक फ्लैट के लिए आवेदन किया और पूरी राशि का भुगतान किया। याचियों ने फ्लैट का भुगतान करने के लिए बैंकों से आंशिक भुगतान करने के लिए ऋण भी लिया था और उसके बाद उन्होंने निर्धारित किश्तों के तहत भुगतान भी कर दिया।

याचियों ने तर्क दिया कि प्राधिकरण तीन वर्षों के भीतर आवास मुहैया कराने में नाकाम रहा। जबकि, उसे फ्लैट सौंपना आवश्यक था। याचियों ने समयावधि बीतने के बाद प्राधिकरण के अधिकारियों से संपर्क भी किया लेकिन उन्हें एक-दो महीने का आश्वासन मिलता रहा। कहा गया कि 2018 में फ्लैट तैयार कर कब्जा दे दिया जाएगा। बाद में प्राधिकरण ने 2019 में फ्लैट देने की बात कही।

फिर कहा गया कि अपरिहार्य कारणों से फ्लैट आवंटित नहीं हो सकते हैं। याचियों को दूसरी योजना के तहत अन्यत्र स्थान पर विकसित फ्लैटों को दिया जाएगा। इसकी मूल्य लागत अधिक होगी। इस पर याचियों ने आपत्ति जताई और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए याचियों को नौ फीसदी ब्याज की दर से रकम को वापस करने का आदेश दिया। 

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तय समय में फ्लैट न आवंटित कर पाने पर हाईकोर्ट ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह याचियों (फ्लैट बुक कराने वाले) कोे उनके द्वारा जमा की गई रकम को नौ प्रतिशत ब्याज की दर से वापस करे। कोर्ट ने कहा है कि याचियों को उनकी रकम दो माह में दे दी जाए। ब्याज की रकम जमा की गई तिथि से देनी होगी।

यही नहीं कोर्ट ने प्राधिकरण को प्रत्येक याची को बीस हजार रुपये हर्जाना भी देने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने शीला रस्तोगी व अन्य, समेद्दीन व 37 अन्य और गौरव गुलाटी व अन्य की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में याचियों की ओर से दाखिल याचिकाओं को आंशिक रूप से ही स्वीकार किया है।

मामले में याचियों की ओर से तर्क दिया गया कि ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने 2013 में लोगों को आवासीय फ्लैट मुहैया कराने के लिए एक ऑफर दिया। कहा कि उसकी तीन इलाकों (ओमिक्रोन, ओमिक्रॉन 1 व सेक्टर 12) में विभिन्न योजनाएं प्रस्तावित हैं। इसके तहत बहुमंजिला इमारत में फ्लैटों की बुकिंग की जा सकती है।

बुकिंग कराने वालों को 2017 तक कब्जा दे दिया जाएगा। याचियों ने योजना के तहत नकद डाउन पेमेंट के आधार पर एक फ्लैट के लिए आवेदन किया और पूरी राशि का भुगतान किया। याचियों ने फ्लैट का भुगतान करने के लिए बैंकों से आंशिक भुगतान करने के लिए ऋण भी लिया था और उसके बाद उन्होंने निर्धारित किश्तों के तहत भुगतान भी कर दिया।

याचियों ने तर्क दिया कि प्राधिकरण तीन वर्षों के भीतर आवास मुहैया कराने में नाकाम रहा। जबकि, उसे फ्लैट सौंपना आवश्यक था। याचियों ने समयावधि बीतने के बाद प्राधिकरण के अधिकारियों से संपर्क भी किया लेकिन उन्हें एक-दो महीने का आश्वासन मिलता रहा। कहा गया कि 2018 में फ्लैट तैयार कर कब्जा दे दिया जाएगा। बाद में प्राधिकरण ने 2019 में फ्लैट देने की बात कही।

फिर कहा गया कि अपरिहार्य कारणों से फ्लैट आवंटित नहीं हो सकते हैं। याचियों को दूसरी योजना के तहत अन्यत्र स्थान पर विकसित फ्लैटों को दिया जाएगा। इसकी मूल्य लागत अधिक होगी। इस पर याचियों ने आपत्ति जताई और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए याचियों को नौ फीसदी ब्याज की दर से रकम को वापस करने का आदेश दिया। 

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