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सिर्फ दीपों का उत्सव नहीं, अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का जीवन-दर्शन है दिवाली

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लखनऊः भारत ऋषियों, संतों और त्योहारों की धरती है। यहां की मिट्टी में संस्कृति इस तरह रची-बसी है कि हर मौसम, हर फसल और हर खगोलीय घटना के साथ कोई-न-कोई पर्व जुड़ा हुआ है। इन असंख्य पर्वों की शृंखला में दीपावली का स्थान सबसे उज्ज्वल है। यह केवल मिट्टी के दीये जलाने और घरों को सजाने का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन की उस गहन चेतना का प्रतीक है, जो अंधकार को अंतिम सत्य नहीं मानती। जब कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या असंख्य दीपों की पंक्तियों से जगमगा उठती है, तब मानो संपूर्ण सृष्टि यह घोषणा करती है कि प्रकाश की शक्ति अंधकार से सदैव बड़ी है। यही कारण है कि दीपावली को प्रकाश, आनंद और आशा का पर्व कहा जाता है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरा भारत इसे अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार, लेकिन समान उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाता है। यही विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

भारतीय संस्कृति सदा से सत्य, धर्म, त्याग और शुभता की उपासक रही है। दीपावली इसी संस्कृति की सजीव अभिव्यक्ति है। इस पर्व से अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। स्कंदपुराण, पद्मपुराण तथा भविष्यपुराण में दीपावली से संबंधित विभिन्न मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। कहीं महाराज पृथु द्वारा पृथ्वी को समृद्ध बनाने के उपलक्ष्य में दीपोत्सव मनाने की परंपरा का संदर्भ मिलता है, तो कहीं पांडवों के वनवास से लौटने पर प्रजाजनों द्वारा दीपमालाओं से स्वागत करने की कथा प्रचलित है। सबसे प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर और रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को दीपों से सजा दिया था। नरकासुर वध और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बंदी बनाई गई राजकन्याओं के उद्धार का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। वहीं, समुद्र मंथन से भगवती लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा इस पर्व को लक्ष्मी पूजन से जोड़ती है।

दीपावली वस्तुतः पांच दिवसीय महापर्व है। इसका आरंभ धनतेरस से होता है, जिस दिन आरोग्य के देवता भगवान धनवंतरि की पूजा तथा नए बर्तन और स्वर्ण खरीदने की परंपरा है। दूसरा दिन नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दीपावली कहलाता है। तीसरे दिन अमावस्या को मुख्य दीपावली मनाई जाती है। इस दिन माता महालक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ कुबेर, सरस्वती तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों में बहीखातों का पूजन किया जाता है। चौथे दिन गोवर्धन पूजा प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है, जबकि पांचवां दिन भाई दूज भाई-बहन के अटूट स्नेह का प्रतीक है। इन पांचों दिनों के मूल में अच्छाई की बुराई पर, न्याय की अन्याय पर और प्रकाश की अंधकार पर विजय का भाव निहित है।

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भारतीय वाङ्मय में उपनिषदों का स्थान अत्यंत ऊंचा है। उनमें संकलित प्रसिद्ध प्रार्थना ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात ‘हे प्रभु! मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए’ भारतीय जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करती है। यह प्रार्थना केवल भौतिक अंधकार से मुक्ति की कामना नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य और मृत्यु से अमरता की ओर बढ़ने की आध्यात्मिक यात्रा है। दीपावली इसी वैदिक चिंतन का व्यावहारिक और सामूहिक स्वरूप है। जब हम दीपक जलाते हैं, तो वह केवल आसपास का अंधकार दूर नहीं करता, बल्कि हमें अपने भीतर झांकने की प्रेरणा भी देता है। मन में व्याप्त अज्ञान, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और नकारात्मकता का अंधकार मिटाकर सद्भाव, विवेक और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाना ही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य है। भारतीय परंपरा में प्रत्येक बाहरी उत्सव को आंतरिक चेतना के जागरण से जोड़ा गया है। इसीलिए दीपावली का सच्चा प्रकाश बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण में विद्यमान है।

दिन-रात बिजली की चकाचौंध और कृत्रिम रोशनी के बीच भी मिट्टी के छोटे से दीपक का महत्व कम नहीं हुआ है। इसका कारण केवल परंपरा नहीं, बल्कि उससे जुड़ा गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भाव है। दीपक मिट्टी से बनता है, तेल अथवा घी से जलता है और स्वयं जलकर दूसरों का मार्ग प्रकाशित करता है। वह त्याग, समर्पण और निः स्वार्थ सेवा का अनुपम उदाहरण है। जिस प्रकार दीपक बिना किसी अपेक्षा के प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी दूसरों के लिए उपयोगी और कल्याणकारी होना चाहिए।

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