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लखनऊ में स्मार्ट प्रीपेड मीटर उपभोक्ताओं में उबाल: बिजली कटौती और बिलों से बढ़ी परेशानी

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लखनऊ : प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने बढ़ते जन-असंतोष पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि समय रहते पारदर्शिता नहीं दिखाई गई तो स्थिति और बिगड़ सकती है। परिषद का दावा है कि कई जिलों में उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आए हैं और सब-स्टेशनों का घेराव कर रहे हैं, जिससे कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।

परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने ऊर्जा मंत्री और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से छह अहम सवालों के सार्वजनिक जवाब मांगे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र द्वारा स्वीकृत 18,885 करोड़ रुपये की योजना को 27,342 करोड़ रुपये में लागू किया गया, जिससे करीब 8,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुआ, इसका लाभ किसे मिला, यह स्पष्ट होना चाहिए।

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इसके अलावा टेंडर लेने वाली कंपनियों की परफॉर्मेंस बैंक गारंटी 10 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत करने, विदेशी विशेषकर चीनी कंपोनेंट्स के उपयोग और 5 प्रतिशत चेक मीटर जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न करने पर भी सवाल उठाए गए हैं।

परिषद ने यह भी पूछा कि उपभोक्ताओं को पोस्टपेड विकल्प क्यों नहीं दिया जा रहा, जबकि विद्युत अधिनियम 2003 में इसका प्रावधान है। परिषद ने आरोप लगाया कि सरकार के निर्देशों के विपरीत स्मार्ट मीटर का खर्च बिजली दरों में जोड़ा जा रहा है। साथ ही कंज्यूमर राइट्स रूल-2020 के बावजूद 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की जा रही। परिषद ने चेतावनी दी है कि यदि इन सवालों के जवाब नहीं मिले तो आंदोलन और तेज होगा।

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