Home अपराध अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़, 9 गिरफ्तार

अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़, 9 गिरफ्तार

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लखनऊ : कमिश्नरेट पुलिस ने ऑपरेशन सीवाई-वज्र के तहत साइबर अपराध के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा किया है। पुलिस ने गिरोह के नौ सदस्यों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि गिरोह साइबर ठगी से हासिल रकम को म्यूल खातों के जरिये निकालकर उसे यूएसडीटी (क्रिप्टो करेंसी) में बदलता था। फिर विदेश खासकर चीनी साइबर अपराधियों के डिजिटल वॉलेट में भेजता था। आरोपियों के पास से 50 एटीएम व क्रेडिट कार्ड, बैंकिंग दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, 53100 रुपये, एक कार व बाइक बरामद की है। गिरोह के चीनी साइबर अपराधियों से जुड़ने के ठोस सबूत मिले हैं। इसकी जांच की जा रही है।

डीसीपी उत्तरी गोपाल कृष्ण चौधरी के मुताबिक डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश पर ऑपरेशन सीवाई-वज्र चलाया जा रहा है। इसके तहत एनसीआरपी व जेएमआईएस पोर्टल पर मिले संदिग्ध म्यूल खातों का सत्यापन किया जा रहा था। इसी क्राइम ब्रांच, साइबर टीम व मड़ियांव पुलिस की संयुक्त टीम को अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग गिरोह के बारे में जानकारी हुई। टीम ने सतर्कता बरतते हुए इस गिरोह का खुलासा किया। नौ आरोपियों को मौके से गिरफ्तार किया। अन्य की तलाश की जा रही है।

डीसीपी उत्तरी गोपाल कृष्ण चौधरी के मुताबिक पुलिस टीम ने जानकीपुरम निवास मो. शाहरूख, डीपीएस स्कूल के पीछे सेक्टर-6 निवासी महफूज खान, गुडंबा के भुंईनदेवी मंदिर कल्याणपुर निवासी सैय्यद अब्दुल्ला, मड़ियांव मोहिबुल्लापुर एकतानगर निवासी मो. बसर, मूलत: बाराबंकी बड्डूपुर का मो. रूबान(मड़ियांव के आईआईएम रोड मुत्तकीपुर), बहराइच के इटहावा का शाबिर (लालबाग हजरतगंज), शाहजहांपुर के रोजा स्थित लोधीपुर का सिकंदर, बलरामपुर के विर्विनय चौराहा का फरहान और शाहजहांपुर जलालनगर स्थित ऐमनजेय निवासी तुफैल शामिल है। पुलिस टीम ने सबसे पहले केशवरनगर मोड़ के पास से मो. शाहरूख को गिरफ्तार किया। उसकी निशानदेही पर आईआईएम रोड सर्विसलेन के पास दबिश दे अन्य आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया।

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इंस्पेक्टर मड़ियांव व क्राइम ब्रांच प्रभारी शिवानंद मिश्रा के मुताबिक जांच में सामने आया कि गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर व सीधे-साधे लोगों को पैसे का लालच देते। उनके नाम से बैंकों में खाते खुलवाते। इसके बाद एटीएम कार्ड, चेकबुक, पासबुक, इंटरनेट बैंकिंग आईडी, पासवर्ड व मोबाइल नंबर अपने पास रख लेते थे। इसके बाद इन खातों का इस्तेमाल म्यूल अकाउंट के रूप में किया जाता था। देशभर में साइबर ठगी से हासिल रकम इन्हीं खातों में जमा कराई जाती थी। बाद में आरोपी एटीएम के जरिए नकदी निकालते या रकम को दूसरे खातों में ट्रांसफर कर देते थे।

आरोपियों से पूछताछ व डिजिटल साक्ष्यों से जानकारी मिली की ठगी की रकम को यूएसडीटी (क्रिप्टो करेंसी) में बदला जाता था। इसके बाद यह राशि विदेशी, विशेषकर चीनी साइबर अपराधियों के डिजिटल वॉलेट में भेजी जाती थी। गिरोह के सदस्य काम के बदले में हर ट्रांजिक्शन पर कमीशन लेते थे। आरोपी टेलीग्राम ओर अन्य ऑन लाइन प्लेटफार्म के जरिये विदेशी साइबर अपराधियों के लगातार संपर्क में रहते थे। बैंक खातों व ट्रांजिक्शन की पूरी जानकारी एक दूसरे से साझा करते थे।

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