Home उत्तर प्रदेश वाराणसी : खादी की राजसी पोशाक में सजेंगे बाबा विश्वनाथ

वाराणसी : खादी की राजसी पोशाक में सजेंगे बाबा विश्वनाथ

0
81

वाराणसी। धार्मिक नगरी काशी में फाल्गुन की ठंडी हवा और गुलाल की आहट के बीच रंगभरी (अमला) एकादशी की तैयारियां जोरों पर हैं। 27 फरवरी को माता गौरा के प्रतीकात्मक गौने को लेकर टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास ‘गौरा-सदनिका’ में जोर-शोर से व्यवस्थाएं चल रही हैं। शताब्दियों पुरानी पालकी और रजत शिवाला की सफाई व मरम्मत का कार्य शुरू हो चुका है।

रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ मंदिर से बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती चल प्रतिमाओं की पालकी यात्रा निकलेगी। यह प्रतीकात्मक गौना काशी की लोक परंपरा को चरम पर पहुंचाता है। महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह की रस्म के बाद महंत आवास ‘गौरा-सदनिका’ गौने की तैयारियों का केंद्र बन जाता है। यहां आंगन में हल्दी की खुशबू, मंगल गीतों की गूंज और श्रृंगार की चहल-पहल से उत्सव का माहौल छा जाता है।

महंत पुत्र वाचस्पति तिवारी ने बताया कि 24 फरवरी (मंगलवार) से चार दिवसीय लोकाचार शुरू होगा। माता गौरा के तेल-हल्दी अनुष्ठान से इसकी शुरुआत होगी। प्रतिमा पूजन के बाद हल्दी की रस्म निभाई जाएगी और गौनहारिनों की टोली पारंपरिक गीत गाकर अनुष्ठान को जीवंत बनाएगी। रंगभरी एकादशी की शोभायात्रा में प्रयुक्त शताब्दियों पुरानी पालकी की सफाई और मरम्मत का दायित्व काशी के काष्ठ कलाकार पप्पू जी निभा रहे हैं। वे इस सेवा में अपने परिवार की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लकड़ी की नक्काशी, धातु की जड़ाई और रजत शिवाला की चमक को सावधानी से निखारते हुए पप्पू जी कहते हैं, “यह केवल काम नहीं, बल्कि भक्ति और सेवा है।” उनके हाथों की कारीगरी में काशी की आस्था झलकती है। रजत शिवाला की चमक को नया आभास देने के साथ इसकी संरचना को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि यात्रा के दौरान कोई व्यवधान न हो।

यह भी पढ़ें -  Afzal Ansari Disqualified: अफजाल अंसारी की संसद सदस्यता रद्द; दो दिन पहले सुनाई गई थी चार साल की सजा

गौने के दिन बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को परंपरागत खादी से बनी राजसी पोशाक पहनाई जाएगी। यह पोशाक विशेष रूप से तैयार कराई जा रही है, जिसमें काशी की पारंपरिक बुनावट और सादगी का सुंदर संगम होगा। माता गौरा का श्रृंगार भी विशेष अलंकरणों और वस्त्रों से किया जाएगा। लाल, पीत और हरित रंगों के संयोजन में सजी प्रतिमा लोक आस्था का केंद्र बनेगी। महंत परिवार स्वयं इस श्रृंगार को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ है।

रंगभरी एकादशी मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत उत्सव है। यह वह दिन है जब शिव-पार्वती विवाह के बाद माता गौरा का प्रतीकात्मक गौना संपन्न होता है और पूरा नगर इस अलौकिक मिलन में सहभागी बनता है। 27 फरवरी को जब माता गौरा का गौना होगा, काशी की गलियों में आस्था का ज्वार उमड़ेगा। शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा एक बार फिर सिद्ध करेगी कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति और सनातन श्रद्धा का स्पंदन है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here